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सुभाषित 2


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे । साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ।। - हितोपदेश


हर एक पर्वत पर माणिक नहीं होते,

हर एक हाथी में गंडस्थल में मोती नहीं होते साधु सर्वत्र नहीं होते ,

हर एक वनमें चंदन नहीं होता ।

उसी प्रकार दुनिया में भली चीजें प्रचुर मात्रा में सभी जगह नहीं मिलती ।

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